Friday, January 31, 2020
पंचकवि-चौरासी घाट : कवि संतोष 'प्रीत' : ब्रह्मा घाट
कहाँ गयी वो प्यार की बातें,
कहाँ गया वो अपना पन।
कल थी जहाँ पे हँसी ठिठोली,
आज वहाँ क्यो है क्रंदन ।।
कहाँ गयी वो छूआ छुई
वो छुपा छुपी गुल्ली डंडा,
और जीत की खातिर अपने
अपनाना वो हथकंडा ,
कहाँ खो गया भोलापन वो
कहाँ खो गया है बचपन ।
कल थी जहाँ पे हँसी ठिठोली,
आज वहाँ क्यो है क्रंदन ।।
अपने सभी पड़ोसी भी
परिवार सरीखा लगते थे,
छोटी छोटी गलती पर वो
अक्सर टोका करते थे,
कहाँ गए काका ताउ जी
कहॉ गए चाचा जुम्मन ।
कल थी जहाँ पे हंसी ठिठोली,
आज वहाँ क्यों है क्रंदन ।।
बदल गए अब सपने अपने
और विचार भी बदल गए,
आज के बच्चे बाप से अपने
कितने आगे निकल गए ,
माता पिता अकेले घर मे,
और साथ है सूनापन।
कहॉ गई वो प्यार की बातें
कहॉ गया वो अपनापन।।
परिवर्तन के दौर में हमने
लोग बदलते देखा है,
अपने स्वार्थ में अपनों को ही
अक्सर छलते देखा है
'प्रीत' प्रभावी आज हो रहा
द्वेष कपट छल ओछापन ।
कल थी जहाँ पे हँसी ठिठोली,
आज वहाँ बस है क्रंदन ।।
पंचकवि-चौरासी घाट : प्रसन्नवदन चतुर्वेदी : दुर्गा घाट
जा रहा है जिधर बेखबर आदमी ।
वो नहीं मंजिलों की डगर आदमी ।
उसके मन में है हैवान बैठा हुआ,
आ रहा है हमें जो नज़र आदमी ।
नफरतों की हुकूमत बढ़ी इस कदर,
आदमी जल रहा देखकर आदमी ।
दोस्त पर भी भरोसा नहीं रह गया,
आ गया है ये किस मोड़ पर आदमी ।
क्या करेगा ये दौलत मरने के बाद,
मुझको इतना बता सोचकर आदमी ।
इस जहाँ में तू चाहे किसी से न डर ,
अपने दिल की अदालत से डर आदमी ।
हर बुराई सुराखें है इस नाव की,
जिन्दगी नाव है नाव पर आदमी ।
आदमी है तो कुछ आदमीयत भी रख,
गैर का गम भी महसूस कर आदमी ।
तू समझदार है ना कहीं और जा,
ख़ुद से ही ख़ुद कभी बात कर आदमी ।
वो नहीं मंजिलों की डगर आदमी ।
उसके मन में है हैवान बैठा हुआ,
आ रहा है हमें जो नज़र आदमी ।
नफरतों की हुकूमत बढ़ी इस कदर,
आदमी जल रहा देखकर आदमी ।
दोस्त पर भी भरोसा नहीं रह गया,
आ गया है ये किस मोड़ पर आदमी ।
क्या करेगा ये दौलत मरने के बाद,
मुझको इतना बता सोचकर आदमी ।
इस जहाँ में तू चाहे किसी से न डर ,
अपने दिल की अदालत से डर आदमी ।
हर बुराई सुराखें है इस नाव की,
जिन्दगी नाव है नाव पर आदमी ।
आदमी है तो कुछ आदमीयत भी रख,
गैर का गम भी महसूस कर आदमी ।
तू समझदार है ना कहीं और जा,
ख़ुद से ही ख़ुद कभी बात कर आदमी ।
पंचकवि-चौरासी घाट : संतोष कुमार' 'प्रीत' : दुर्गा घाट
बदल गई बचपन की सूरत बदल गया ये तन अपना।
लेकिन अब तक बदल न पाया बच्चो वाला मन अपना।।
छुआ छुई ओ छुपा छुपी ओ अंटी ओ गुल्ली डंडा,
तरह तरह की जीत की खातिर अपनाना ओ हथकंडा,
बदल गए ओ खेल पुराने बदल गया बचपन अपना।
लेकिन अब तक बदल न पाया बच्चो वाला मन अपना।।
काले बल सफेद हो रहे उम्र बयालीस पार हुआ,
परिवर्तन है नियम प्रकृत का इससे सब दो चार हुआ,
बदल गई ये सारी दुनिया बदल गया जीवन अपना।
लेकिन अब तक बदल न पाया बच्चो वाला मन अपना।।
आंखे भी कमजोर हो रही और ये दो से चार हुई,
कठिन परिश्रम करने में अब यह शरीर लाचार हुई,
बदल गया परिमाप बदन का बदल गया है बसन अपना।
लेकिन अब तक बदल न पाया बच्चो वाला मन अपना।।
बच्चे भी अब बड़े ही गए बन गए बाबा नाना जी,
अपने ही घर मे सब अपने बात पे आना काना जी,
बदल गए संस्कार पुराने बदल गई उलझन अपना।
लेकिन अब तक बदल न पाया बच्चो वाला मन अपना।।
बुढ़ापे को ओर अग्रसर लगती है अपनी काया,
'प्रीत' है सच्चा एक जगत में बाकी सब मिथ्या माया,
बदल गई है सोच सभी की बदल गया दर्शन अपना।
लेकिन अब तक बदल न पाया बच्चो वक मन अपना।।
पंचकवि-चौरासी घाट : प्रसन्न वदन चतुर्वेदी : शीतला घाट
क्या रखा है जलने और जलाने में |
आ जाओ तुम साथी आग बुझाने में |
नफरत से वैसे भी तुम क्या पा लोगे,
क्या जाता है बोलो प्यार जताने में |
गोली-बम में रुपए-पैसे लगते हैं,
बस मीठी बोली है साथ निभाने में |
जीवन एक सफर है सबको चलना है,
क्या पाओगे राहों से भटकाने में |
कुदरत से लड़कर ये पौधा पेड़ बना,
बस इक पल लगता है इसे गिराने में |
आप समुन्दर बन के जो दिखलाओगे,
देर न होगी नदियों को भी आने में |
लोग नसीहत औरों को दे देते हैं,
खुद डरते हैं उस रस्ते से जाने में |
खोने को
तो इक पल में ही खो दोगे,
वक्त बहुत लगता इंसान कमाने में |
पंचकवि-चौरासी घाट : संतोष कुमार 'प्रीत' : शीतला घाट
देश पर है अभिमान लिखेंगे।
कब तक झूठी शान लिखेंगे।।
नही सुरक्षित घर मे नारी,
सदा सत्य पर झूठ है भारी।
रक्षक ही भक्षक है अब तो,
सबकी है अपनी लाचारी ।।
देख के है हैरान लिखेंगे ।
कब तक झूठी शान लिखेंगे।।1।।
जात धर्म मे बटी हुई है,
मानवता ही घटी हुई है।
संस्कार की चादर देखा,
जहाँ तहाँ से फटी हुई है।।
इसी को क्या उत्थान लिखेंगे।
कब तक झूठी शान लिखेंगे।।2।।
गली गली में यहाँ मवाली,
शहर शहर में बसे बवाली।
जहाँ सुरक्षित रहें बेटिया ,
कोई जगह न ऐसी खाली।।
मुश्किल को आसान लिखेंगे।
कब तक झूठी शान लिखेंगे।।3।।
जो है हम सब के अन्नदाता,
कर्ज में डूबा वही बिधाता।
छोड़ बिलखता निज कुटुम्ब को,
फाँसी को है गले लगाता ।।
कैसे खुशी किसान लिखेंगे,
कब तक झूठी शान लिखेंगे।।4।।
अपनो से जो रहे कटे है,
देश की खातिर सदा मिटे है।
ग्रीष्म शीत बरसात हो चाहे,
सीमा पर जो रहे डटे है ।।
होते नित कुर्बान लिखेंगे ।
कब तक झूठी शान लिखेंगे।।5।।
शीर्ष पे जो नेता आ जाते,
एक दूजे का दोष गिनाते।
मुझमे कम है तुझमे ज्यादा,
भ्र्ष्टाचार की बात बताते ।।
करते बस अपमान लिखेंगे।
कब तक झूठी शान लिखेंगे।।6।।
घर का कूड़ा बाहर फेका,
क्या होगा जो किसी ने देखा।
कौन लड़ाई करे किसी से,
सबाकी अपनी लक्ष्मण रेखा।।
इसे स्वस्छ अभियान लिखेंगे।
कब तक झूठी शान लिखेंगे।।7।।
चलता यहाँ पे गोरख धंधा,
अपना तो कानून है अंधा।
कभी सही जो करना चाहे,
अध्यादेश का पड़ता फंदा।।
आरक्षण का मान लिखेंगे।
कब तक झूठी शान लिखेंगे।।8।।
चारो तरफ तो यही शोर है,
हाथ मे जिसकी बागडोर है।
जनता का दुख दर्द क्या समझे,
उसका ध्यान तो कही और है।।
कैसे इन्हें प्रधान लिखेंगे ।
कब तक झूठी शान लिखेंगे।।9।।
हम है ऐसे देश के वासी,
जहाँ की महिमा थी अविनासी।
चारो तरफ वहाँ फैले है,
कुकर्मी साधु सन्यासी ।।
अंधभक्त अनजान लिखेंगे।
कब तक झूठी शान लिखेंगे।।10।।
हमको खुद ही चलना होगा,
अंधियारे को छलना होगा।
अगर रोशनी की चाहत है,
स्वयम दीप बन जलना होगा ।।
'प्रीत' शुरू अभियान लिंखेंगे।
कब तक झूठी शान लिखेंगे।।11।।
पञ्चकवि-चौरासी घाट : प्रसन्न वदन चतुर्वेदी : पंचगंगा घाट
कहाँ हैं राम कैसे हैं बताएं |
जरूरत है धरा पर आप आएं |
नहीं है अब कहीं सम्बन्ध ऐसे, जो रामायण में
बरसों से पढ़ा है,
नहीं है त्याग और आदर्श ऐसे, तेरे इतिहास ने
जिनको गढ़ा है,
कई प्रतिमान तुमने है दिखाए, कहीं जिनको नहीं हम
आज पाएं |
न बेटा आप जैसा बन सके हम, न भाई आप जैसा कोई
पाया,
न धन-दौलत कभी ठुकरा सके हम, न जंगल में कभी
जीवन बिताया,
दिए स्वारथ, अहम के बुझ न पाए, भले रावण यहाँ हम
सब जलाएं |
किसी को पाप करते देखकर भी, कभी रोका नहीं टोका
नहीं है,
दिखे हर ओर भ्रष्टाचार इतना, ये संस्कारों से
क्या धोखा नहीं है,
व्यथा अपनी भला किसको सुनाएं, कहीं आदर्श सारे
खो न जाएं |
नहीं है निर्भया निर्भय यहाँ अब, सुरक्षित अब
नहीं कोई प्रियंका,
नरों के भेष में हम भेड़िये हैं, बजा ले लाख
संस्कारों का डंका,
हकीकत इक-न-इक दिन खुल ही जाए, भले हम लाख मुहँ
अपना छिपाएं |
दरिन्दे घूमते हैं अब यहाँ पर, दया संवेदना
दिखती नहीं है,
निकलती जब अकेली घर से बेटी, लगे डर जब तलक आती
नहीं है,
पढ़ाओ बेटियाँ नारा लगाएं, बचे बेटी तो हम बेटी
पढाएं |
Tuesday, December 10, 2019
पंचकवि-चौरासी घाट-1 : संतोष कुमार 'प्रीत' : पंचगंगा घाट
1.
पंच गंगा के घाट पर, पंच कवि के संग।
काव्य पाठ को आ गए, रँगे प्रीत के रंग।।
2.
ब्रह्मा के कमण्डल से निकली
शिव शंकर के लट में ठहरी।
भगीरथ के तप के कारण,
माँ गंगा धरती पर उतरी ।।
3.
देखिए गंगा हमारी, कैसी निर्बल हो गई।
स्वर्ग से आई सुधा थी, बिष भरा जल हो गई।।
सुरसरी मन्दाकिनी विष्णुनदी देवापगा,
हरी नदी भागीरथी है शोभती शिव की जटा।
सैकणों हैं नाम इसके नाम में रख्खा है क्या,
सच तो ये है इस धरा पर हर किसी की है ये माँ।।
अपने ही बच्चों के कारण माँ की गरिमा खो गई।
स्वर्ग से आई सुधा थी विष भरा जल हो गई।।
हर किसी को दे सहारा बाँह गंगा जल की है,
स्वर्ग को ले जाए जो वह राह गंगा जल की है।
प्राण जब निकले बदन से चाह गंगा जल की है,
हृदय को अब व्यथित कर दे आह गंगा जल की है।।
जीवन दायनी पाप नाशिनी आज गरल हो गई।
स्वर्ग से आई सुधा थी विष भरा जल हो गई।।
स्वक्छ निर्मल नीर गंगा का रहे यह ध्यान हो,
आत्मीक सम्मान से बढ़ कर के इसका मान हो।
अपने प्राकृतिक ही गुणों में हो तो जग कल्याण हो,
खो न जाये यह कही अपना धरा वीरान हो।।
'प्रीत' पावन माँ का देखो मैली आँचल हो गई।
स्वर्ग से आई सुधा थी विष भरा जल हो गई।।
4.
मधुर भावना हो हृदय में हमेशा
सभी के लिए कामना है हमारी,
न हो द्वेष नफरत न शिकवा शिकायत
किसी के लिए कामना है हमारी।
मिली चार दिन की जो ये जिंदगी है
इसे व्यर्थ यूँ ही न कोई गवाए,
मिले जो किसी से लिये 'प्रीत' दिल में
खुशी के लिए कामना है हमारी।।
पंचकवि-चौरासी घाट-1 : डॉ. सर्वेशानन्द : पंचगंगा घाट
[1]
काशी में जाने गये, हैं चौरासी घाट |
ज्ञान धर्म संस्कृति सभी, मिलते इनके बाट ||
[२] मुक्तक
* पाँच नदियों का संगम इसी घाट पर
पंच तीर्थों का संगम इसी घाट पर
गुरु बनाये कबीरा मिला ज्ञान था
साढ़े कितनों ने सरगम इसी घाट पर
**माँ गंगा की लहरों में हम
घाटों के इन पहरों में हम
चले है जन जन गीत सुनाने
सुबहो शाम दोपहरों में हम
[3 ]
वक्त जो लाये ढ़ाल तो ढ़लकर देखो तुम |
उम्मीदों की राह पे चलकर देखो तुम ||
चलते चलते एक दिन मंजिल आएगी |
गिरों हज़ारों बार सम्भलकर देखो तुम ||
अपनापन तो अपनी हद को तय करता है |
गैरों की आवाज में खुलकर देखो तुम ||
जीत मिले तो हारे का सम्मान करो |
हार मिले तो जीत में घुलकर देखो तुम ||
काशी में जाने गये, हैं चौरासी घाट |
ज्ञान धर्म संस्कृति सभी, मिलते इनके बाट ||
[२] मुक्तक
* पाँच नदियों का संगम इसी घाट पर
पंच तीर्थों का संगम इसी घाट पर
गुरु बनाये कबीरा मिला ज्ञान था
साढ़े कितनों ने सरगम इसी घाट पर
**माँ गंगा की लहरों में हम
घाटों के इन पहरों में हम
चले है जन जन गीत सुनाने
सुबहो शाम दोपहरों में हम
[3 ]
वक्त जो लाये ढ़ाल तो ढ़लकर देखो तुम |
उम्मीदों की राह पे चलकर देखो तुम ||
चलते चलते एक दिन मंजिल आएगी |
गिरों हज़ारों बार सम्भलकर देखो तुम ||
अपनापन तो अपनी हद को तय करता है |
गैरों की आवाज में खुलकर देखो तुम ||
जीत मिले तो हारे का सम्मान करो |
हार मिले तो जीत में घुलकर देखो तुम ||
पंचकवि-चौरासी घाट-1 : शम्भूनाथ दूबे 'शैल' : पंचगंगा घाट
केवल नदी नहीं है, संस्कार है गंगा
कैसे न गाँउ गीत मेरी मां हैं गंगा।।
केवल नदी नहीं है संस्कार है गंगा।।
गंगा है द्वार मुक्ति का
हर वक्त खुला है।
काशी गवाह है कि यहां
सत्य तुला है
धर्म जाति देश का, श्रृंगार है गंगा...
कैसे न गाँउ गीत मेरी मां हैं गंगा...
नहरों के जाल में कभी
बांधों के जाल में
आके फंस रहीं हैं मां
शहरों की जाल में
फिर भी कुछ न कह रहीं लाचार हैं गंगा
कैसे न गाँउ गीत मेरी मां हैं गंगा...
गंगा के पास दर्द हैं
आवाज़ नहीं है
रोने और चिल्लाने की
रिवाज़ नहीं है
ममतामयी है देवी, मजबूर हैं गंगा...
कैसे न गाँउ गीत मेरी मां हैं गंगा...
आओ जरा सा देखें तो,
क्या इसका हाल है
जीना मुहाल है और
मरना मुहाल है
जन जन का करती सदियों से
उद्धार ये गंगा...
कैसे न गाँउ गीत मेरी मां हैं गंगा...
Tuesday, March 13, 2018
कवि सम्मलेन और होली मिलन समारोह
दिनांक 12-3-18 को मोढ़ेला, चाँदपुर, वाराणसी में कवि सम्मेलन और होली मिलन समारोह का आयोजन हुआ
जिसमें काव्यपाठ का अवसर प्राप्त हुआ। उक्त सम्मेलन में श्री बद्री विशाल,
श्री नरेश 'शांडिल्य', श्रीमती रजनी अग्रवाल, नसीम निशा, विनोद 'पानीदार',
'आवारा' , गुरु अमिताभ मिश्र, श्री सन्तोष आदि कवियों-कवियित्रियों ने भी
काव्यपाठ किया और सम्मेलन को एक नई ऊँचाई प्रदान किया। प्रस्तुत है वहाँ के
कुछ छाया चित्र...
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