Friday, January 31, 2020
पंचकवि-चौरासी घाट : प्रसन्नवदन चतुर्वेदी : बूंदी-परकोटा घाट
इस गए साल ने हमसे
ऐसा किया |
कुछ बुरा कर गया कुछ
तो अच्छा किया |
हमने सोचा बहुत पा
सके सब नहीं,
मन की इच्छा में यूं
रह गई कुछ कमी |
वक्त की चाल पे क्यों
भरोसा किया........
बेटी-बेटे गए अगले
दर्जे में अब,
कुछ इजाफा हुआ फिर से
कर्जे में अब,
काम-धंधे ने यूं
बेसहारा किया..........
कुछ नए लोग जीवन में
हमसे मिले,
बढ़ गए कुछ पुरानों के
शिकवे गिले,
बात बढ़ने से उनसे
किनारा किया......
गम ख़ुशी के कई जाम
पीते रहे,
इक नई आस में हम तो
जीते रहे,
कुछ भला आगे होगा ये
सोचा किया....
कुछ पुराने थे अपने,
बिछड़ भी गए,
हम कई बार तनहा से पड़
भी गए,
फिर संभलकर न्य इक
इरादा किया......
साल जो आएगा वो ख़ुशी
लाएगा,
दूर गम होंगे लब पर हंसी
लाएगा,
वक्त ने हमसे ऐसा
इशारा किया......
पंचकवि-चौरासी घाट : कवि संतोष कुमार 'प्रीत' : बूंदी-परकोटा घाट
हँसते हँसते दर्द को सहते
आँसू पीना बड़ा कठिन है।
आँसू पीना बड़ा कठिन है।
जीवन जीना बड़ा कठिन है ।।
आशा और निराशा क्या है,
इस मन की अभिलाषा क्या है।
अब तक तो यह समझ न पाया,
जीवन की परिभाषा क्या है ।।
तार तार सब रिश्ते होते
उनको सीना बड़ा कठिन है।
जीवन जीना बड़ा कठिन है ।।
किसे पता है कल क्या होना,
क्या पाना है क्या है खोना ।
यही समझ पाया हूँ अब तक,
हर कोई है एक खिलौना ।।
खेल रहा है कोई इनसे,
उसे समझना बड़ा कठिन है।
जीवन जीना बड़ा कठिन है ।।
पतझड़ है मधुमास कभी है,
घिरी घटा आकाश कभी है।
कभी शरद की ठिठुरन है तो
ग्रीष्म का भी अभास कभी है।।
बिना 'प्रीत' जो भी है गुजरा
वही महीना बड़ा कठिन है ।
जीवन जीना बड़ा कठिन है ।।
पञ्चकवि चौरासी घाट : प्रसन्नवदन चतुर्वेदी : ब्रह्मा घाट
न्यायालय में न्याय
नहीं है |
कुछ भी तो पर्याय
नहीं है |
मत बाँधो इसको खूंटे
से,
बेटी है ये गाय नहीं
है |
मोमबत्तियां जला रहे
हैं,
न्याय भरा समुदाय
नहीं है |
खर्चे पर खर्चे करते
हैं,
लेकिन कोई आय नहीं है
|
अपराधी फल-फूल रहे
हैं,
क्या अब लगती हाय
नहीं है |
जब अखबार नहीं; लगता
है,
आज सुबह की चाय नहीं
है |
तेरी-मेरे,
इसकी-उसकी,
मिलती क्योकर राय
नहीं है |
जयचन्दों से देश भरा
है,
कोई पन्ना-धाय नहीं
है |
पंचकवि-चौरासी घाट : कवि संतोष 'प्रीत' : ब्रह्मा घाट
कहाँ गयी वो प्यार की बातें,
कहाँ गया वो अपना पन।
कल थी जहाँ पे हँसी ठिठोली,
आज वहाँ क्यो है क्रंदन ।।
कहाँ गयी वो छूआ छुई
वो छुपा छुपी गुल्ली डंडा,
और जीत की खातिर अपने
अपनाना वो हथकंडा ,
कहाँ खो गया भोलापन वो
कहाँ खो गया है बचपन ।
कल थी जहाँ पे हँसी ठिठोली,
आज वहाँ क्यो है क्रंदन ।।
अपने सभी पड़ोसी भी
परिवार सरीखा लगते थे,
छोटी छोटी गलती पर वो
अक्सर टोका करते थे,
कहाँ गए काका ताउ जी
कहॉ गए चाचा जुम्मन ।
कल थी जहाँ पे हंसी ठिठोली,
आज वहाँ क्यों है क्रंदन ।।
बदल गए अब सपने अपने
और विचार भी बदल गए,
आज के बच्चे बाप से अपने
कितने आगे निकल गए ,
माता पिता अकेले घर मे,
और साथ है सूनापन।
कहॉ गई वो प्यार की बातें
कहॉ गया वो अपनापन।।
परिवर्तन के दौर में हमने
लोग बदलते देखा है,
अपने स्वार्थ में अपनों को ही
अक्सर छलते देखा है
'प्रीत' प्रभावी आज हो रहा
द्वेष कपट छल ओछापन ।
कल थी जहाँ पे हँसी ठिठोली,
आज वहाँ बस है क्रंदन ।।
पंचकवि-चौरासी घाट : प्रसन्नवदन चतुर्वेदी : दुर्गा घाट
जा रहा है जिधर बेखबर आदमी ।
वो नहीं मंजिलों की डगर आदमी ।
उसके मन में है हैवान बैठा हुआ,
आ रहा है हमें जो नज़र आदमी ।
नफरतों की हुकूमत बढ़ी इस कदर,
आदमी जल रहा देखकर आदमी ।
दोस्त पर भी भरोसा नहीं रह गया,
आ गया है ये किस मोड़ पर आदमी ।
क्या करेगा ये दौलत मरने के बाद,
मुझको इतना बता सोचकर आदमी ।
इस जहाँ में तू चाहे किसी से न डर ,
अपने दिल की अदालत से डर आदमी ।
हर बुराई सुराखें है इस नाव की,
जिन्दगी नाव है नाव पर आदमी ।
आदमी है तो कुछ आदमीयत भी रख,
गैर का गम भी महसूस कर आदमी ।
तू समझदार है ना कहीं और जा,
ख़ुद से ही ख़ुद कभी बात कर आदमी ।
वो नहीं मंजिलों की डगर आदमी ।
उसके मन में है हैवान बैठा हुआ,
आ रहा है हमें जो नज़र आदमी ।
नफरतों की हुकूमत बढ़ी इस कदर,
आदमी जल रहा देखकर आदमी ।
दोस्त पर भी भरोसा नहीं रह गया,
आ गया है ये किस मोड़ पर आदमी ।
क्या करेगा ये दौलत मरने के बाद,
मुझको इतना बता सोचकर आदमी ।
इस जहाँ में तू चाहे किसी से न डर ,
अपने दिल की अदालत से डर आदमी ।
हर बुराई सुराखें है इस नाव की,
जिन्दगी नाव है नाव पर आदमी ।
आदमी है तो कुछ आदमीयत भी रख,
गैर का गम भी महसूस कर आदमी ।
तू समझदार है ना कहीं और जा,
ख़ुद से ही ख़ुद कभी बात कर आदमी ।
पंचकवि-चौरासी घाट : संतोष कुमार' 'प्रीत' : दुर्गा घाट
बदल गई बचपन की सूरत बदल गया ये तन अपना।
लेकिन अब तक बदल न पाया बच्चो वाला मन अपना।।
छुआ छुई ओ छुपा छुपी ओ अंटी ओ गुल्ली डंडा,
तरह तरह की जीत की खातिर अपनाना ओ हथकंडा,
बदल गए ओ खेल पुराने बदल गया बचपन अपना।
लेकिन अब तक बदल न पाया बच्चो वाला मन अपना।।
काले बल सफेद हो रहे उम्र बयालीस पार हुआ,
परिवर्तन है नियम प्रकृत का इससे सब दो चार हुआ,
बदल गई ये सारी दुनिया बदल गया जीवन अपना।
लेकिन अब तक बदल न पाया बच्चो वाला मन अपना।।
आंखे भी कमजोर हो रही और ये दो से चार हुई,
कठिन परिश्रम करने में अब यह शरीर लाचार हुई,
बदल गया परिमाप बदन का बदल गया है बसन अपना।
लेकिन अब तक बदल न पाया बच्चो वाला मन अपना।।
बच्चे भी अब बड़े ही गए बन गए बाबा नाना जी,
अपने ही घर मे सब अपने बात पे आना काना जी,
बदल गए संस्कार पुराने बदल गई उलझन अपना।
लेकिन अब तक बदल न पाया बच्चो वाला मन अपना।।
बुढ़ापे को ओर अग्रसर लगती है अपनी काया,
'प्रीत' है सच्चा एक जगत में बाकी सब मिथ्या माया,
बदल गई है सोच सभी की बदल गया दर्शन अपना।
लेकिन अब तक बदल न पाया बच्चो वक मन अपना।।
पंचकवि-चौरासी घाट : प्रसन्न वदन चतुर्वेदी : शीतला घाट
क्या रखा है जलने और जलाने में |
आ जाओ तुम साथी आग बुझाने में |
नफरत से वैसे भी तुम क्या पा लोगे,
क्या जाता है बोलो प्यार जताने में |
गोली-बम में रुपए-पैसे लगते हैं,
बस मीठी बोली है साथ निभाने में |
जीवन एक सफर है सबको चलना है,
क्या पाओगे राहों से भटकाने में |
कुदरत से लड़कर ये पौधा पेड़ बना,
बस इक पल लगता है इसे गिराने में |
आप समुन्दर बन के जो दिखलाओगे,
देर न होगी नदियों को भी आने में |
लोग नसीहत औरों को दे देते हैं,
खुद डरते हैं उस रस्ते से जाने में |
खोने को
तो इक पल में ही खो दोगे,
वक्त बहुत लगता इंसान कमाने में |
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