Wednesday, July 18, 2012

बनारस के कवि और शायर/ श्री विन्ध्याचल पाण्डेय

       आज मैं बनारस के एक काव्यजगत के अप्रतिम हस्ताक्षर और मेरे मित्र श्री विन्ध्याचल पाण्डेय की रचनाएं आप के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। श्री विन्ध्याचल पाण्डेय बनारस काव्य-मंचों के बहुत ही मशहूर कवि हैं और ये अपनी कविता में नये तेवर के लिए जाने जाते हैं। आशा है आपको ये रचनाएं पसन्द आयेंगी....


ग़ज़ल-1

अजीब बात अजीब दौर अजब लोग यहाँ।
न जाने कौन-सा फैला हुआ है रोग यहाँ।


उपनिषद, वेद, संहिताएं कौन गुनता है,
बदल कलेवर हुआ योगा अब तो योग यहाँ।


धर्म के मर्म से अनजान इण्डिया वाले,
त्याग, वैराग्य पर भारी है अब तो भोग यहाँ।


डूबती नाव, भंवर और नशे में माझी,
बन रहा इस तरह हठाग्रही कुयोग यहाँ।


अर्थ के फेर में अनर्थ का समर्थन है,
उदारता में उदारीकरण का सोग यहाँ।

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ग़ज़ल-2

सच न कहेंगे, सच न सुनेंगे, इसलिए हम है आज़ाद।
सुरा-सुन्दरी, भ्रष्टाचार जिन्दाबाद, जिन्दाबाद।


सुविधा-शुल्क और महंगाई, इसीलिए सरकार बनाई,
कौन सुनेगा किसे सुनाएं अब जाकर जनता फरियाद।


सूर, कबीर, निराला, तुलसी, गालिब, मीर मील के पत्थर,
नई फसल के लिए शेष है अब तो केवल वाद-विवाद।


सेण्टीमेण्ट विलुप्त हो रहा, इन्स्ट्रुमेन्टल प्यार हो गया,
झूम रहे हैं, घूम रहे हैं, कौन करे इसका प्रतिवाद।


क्षेत्रवाद, आतंकवाद को भाषा, धर्म से जोड़ा,
सत्ता वाली कुर्सी खातिर, करते नए-नए इजाद।

Friday, June 18, 2010

बनारस के कवि और शायर/रामदास अकेला

बनारस के शायर की अगली कडी़ में रामदास अकेला जी की रचनाएं प्रस्तुत हैं।आप की जन्मतिथि है २४-०३-१९४२|जन्मतिथि है-ग्राम-लखनेपुर,पो०-घनश्यामपुर जिला-जौनपुर| आप के पिता का नाम है- स्व० बलीराम भगत।आप प्रवर अधीक्षक [डाक विभाग] के पद से सेवा निवृत्त होकर साहित्य सेवा में संलग्न है।गीत,ग़ज़ल,मुक्तक एवं नवगीतों की रचना आप को विशेष रूप से पसन्द है।आप द्वारा रचित ‘आईने बोलते हैं’ ग़ज़ल संग्रह 1999 में प्रकाशित।आप की बहुत सी रचनाएं दूरदर्शन और आकाशवाणी पर प्रसारित हो चुकी हैं।आप अदबी-संगम[हिन्दी-उर्दू साहित्यिक संस्था]वाराणसी के अध्यक्ष तथा प्रगतिशील लेखक संघ के उपाध्यक्ष भी रहे |

1. कैसे-कैसे इसे गुजारी है :-

कैसे-कैसे इसे गुजारी है।
ज़िन्दगी यार फिर भी प्यारी है।

मालोज़र की कोई कमी तो नही,
हाँ मगर प्यार की दुश्वारी है।

ज़िन्दगी कौन कब तलक ढोता,
ये तो खु़द मौत की सवारी है।

बाप मरता तो भला कैसे वो,
जिसकी बेटी अभी कुँवारी है।

भार से डालियों के टूट रहे,
ये दरख्तों की अदाकारी है।

ये तो गुज़री है नींद में यारों,
भरम रहा कि शब्बेदारी है।

होश में कैसे ’अकेला’ रहता,
होशवालों में मारामारी है।


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2. ज़िन्दगी के वास्ते क्या-क्या है :-

ज़िन्दगी के वास्ते क्या-क्या है करता आदमी।
अपनी ही परछाइयों से डर के मरता आदमी।

अपने हक़ में कोई भी तामीर क्या कर पायेगा,
खण्डहरों की ईंट सा खुद ही बिखरता आदमी।

रख दिया है आईना जबसे सड़क के बीच में,
मुँह बनाता फेरकर चेहरा बनाता आदमी।

रंग, नस्लों, धर्म,मज़हब जातियां दर जातियां,
अनगिनत फिरकों में जुड़ता और बिखरता आदमी।

थे ज़मीं था आसमां परवाज में इसके कभी,
परकटे पंछी सा है अब फड़फडा़ता आदमी।

दावतों के बाद जूठन फेंक देता जब कोई,
ढेर पर कुडे़ के चुन कर पेट भरता आदमी।

किस कदर नाराज़ लगता है ये अपने आप से,
बुदबुदाता फिर रहा है पागलों सा आदमी।

ज़िन्दगी भर दूसरों की फ़िक्र में उलझा रहा,
अपने बारे में कभी कुछ फ़िक्र करता आदमी।

एक मुट्ठी खा़क पर करता रहा इतना गुमान,
काश मिट्टी की हकी़क़त को समझता आदमी।

अपनी इक पहचान तो इसको बनानी चाहिए,
काफ़िले के साथ हो या हो अकेला आदमी।


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3.बोलियाँ अब न भाषाएं वही :-

बोलियाँ अब न भाषाएं वही।
कब तलक गायेंगे गाथाएं वही।

कारवां लेकर हमारा चल पडे़,
जो खडी़ करते हैं बाधाएं वही।

आँख के अन्धे हैं लेकिन लिख रहे,
कौम के माथे की रेखाएं वही।

हम रहे अब भी लकीरों के फकीर,
तोड़ते अक्सर हैं सीमाएं वही।

अस्मिता जिनसे वतन की दावं पर,
हाय वन्देमातरम गाएं वही।

चीखते हैं जो धरम के नाम पर,
नफ़रतों की आग भड़काएं वही।

हाथ में लेकर चले हो आईना,
देखना पत्थर न फिर आएं वही।

चल ‘अकेला’कुछ नई बातें करें,
मत सुनाना फिर से कविताएं वही।

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4. चढ़ तो गये ऊँचाइयों पे धूमधाम से :-

चढ़ तो गये ऊँचाइयों पे धूमधाम से।
बदली नज़र तो गिर पडे़ औंधे धडा़म से।

करता रहा सलाम,कभी झुक के दूर से,
करने लगा है बात वही तुम-तडा़म से।

बदले हुए मौसम की ये तासीर खूब है,
मेढक भी परेशान है सर्दी-जु़काम से।

हाथों से निकल तोते बहुत दूर उड़ गये,
रखा था जिन्हें हमने बहुत एहतेमाम से।

औरों के हाल पर तो हँसे भूल क्यूँ गये,
तुमको भी गुजरना है कभी उस मुकाम से।

गुम होके रह गया है इसी भीड़ में कहीं,
निकला तो ‘अकेला’ था किसी और काम से।


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5. संसद से सड़कों तक देखा :-

संसद से सड़कों तक देखा सब उद्योग लगे।
बेकारी से फिर भी जूझते हमको लोग लगे।

खुद क्या थे,क्या हैं,क्या होंगे;क्या मालूम उन्हें,
औरों का कद छोता करने में जो लोग लगे।

वो क्या जाने भूख की शिद्दत कीमत रोटी की,
भक्तों के आटा-घी से ही जिनका भोग लगे।

हम खोये रहते तलाश में जीवन भर जिसकी,
उनकी नज़र में एक समाधी और संभोग लगे।

ईर्ष्या,द्वेष,अहं और नफरत,लालच,बेइमानी;
एक बेचारे मन को जाने कितने रोग लगे।

तनहाई में यूँ ही अकेला भटकेगा कब तक,
साथ तुम्हारे लोग भी आयें कब संयोग लगे।

श्रद्धांजलि/रामदास ‘अकेला’

प्रिय मित्रों, वाराणसी के काव्य-संसार के एक सशक्त हस्ताक्षर श्री रामदास ‘अकेला’ जी ( जिनकी गज़लें आप ‘‘बनारस के कवि और शायर/रामदास अकेला’’ में पढ़ चुके हैं ) ; इस नश्वर दुनिया को छोड़ गये। वाराणसी से बाहर होने के कारण मुझे इसका पता देर से चला....... दिवंगत काव्यात्मा को मेरी ओर से विनम्र श्रद्धांजलि...........

Saturday, March 20, 2010

बनारस के शायर /नरोत्तम शिल्पी

बनारस के कवि/शायर में इस बार आप नरोत्तम शिल्पी की रचनाओं का आनन्द उठायेंगे।नरोत्तम शिल्पी का जन्म २० जनवरी सन १९४५ को काज़ीपुरा खुर्द,औरंगाबाद,वाराणसी में हुआ।आपके पिताजी का नाम मेवालाल विश्वकर्मा तथा माता का नाम श्रीमती राजकुमारी देवी है।आप मुर्तिकला और चित्रकला के जानकार हैं और इसी लिये आप ’शिल्पी’ नाम से जाने जाते हैं।आप की संगीत और नाट्य में बेहद रुचि रखते हैं।आप की प्रकाशित पुस्तक है-बुतों के बीच।आप का पता है-सी-८/२८ चेतगंज,वाराणसी।यहाँ इनकी चार ग़ज़लें और एक गीत प्रस्तुत है-




1. वक्त की शायद ये हैं अंगडा़इयाँ :-

वक्त की शायद ये हैं अंगडा़इयाँ।
हैं जुदा मुझसे मेरी परछाइयाँ। 


क्यूं कहूँ तनहा कभी मैं ना रहा,
भीड़ में हैं खल रहीं तनहाइयाँ।


धुन सुनी है जिन्दगानी के खि़लाफ़,
मौत की दस्तक हैं ये शहनाइयाँ।


कर रहे थे रहबरी जो एक दिन,
खोदते हैं अब तो वे ही खाइयाँ।


साथ में आया हूँ जिसके मैं यहाँ,
हो मुबारक उसको ये ऊँचाइयाँ।


नाम शिल्पी का बहुत बदनाम है,
क्या हुआ,बढ़ जायेगी रुसवाइयाँ।


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2. दबे पाँव आती है यादें तुम्हारी :-

दबे पाँव आती है यादें तुम्हारी।
उसी दम मचलती है धड़कन हमारी।


कलम साथ होती नहीं है हमेशा,
तसव्वुर बनाता है तस्वीर प्यारी।


हुए चन्द अशआर तेरी बदौलत,
भरी गोद कागज़ की जो थी कुँआरी।


न आए न आए कहा पर न आए,
भरे आह ये मज्बूरियाँ ये बेचारी।


करम है सनम का लुटाता है जलवा,
तबर्रुख में उलझा सनम का पुजारी।


रहम कर के क्या दे दिया ये तो सोचो,
भला कैसे जिये ये भूखा भिखारी।


जरा साथ बैठो कहीं पर कभी भी,
सुनाएं कि ’शिल्पी’ ने कैसे गुजारी।


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3. ऐसी पेचीदगी कहाँ होगी :-

ऐसी पेचीदगी कहाँ होगी।
अपनी सी ज़िन्दगी कहाँ होगी।


दर्द सहता ही नहीं पीता हूँ,
इतनी बेचारगी कहाँ होगी।


तंग दस्ती में समझना आसां,
कितनी पाबन्दगी कहाँ होगी।


फूल तो गढ़ के बना सकता हूँ,
पर वही ताज़गी कहाँ होगी।


बोझ इतना लदा है काँधे पर,
मुझसे आवारगी कहाँ होगी।


हाथ उठते नहीं दुआ के लिए,
फिर तो अब बन्दगी कहाँ होगी।


मयकदा बन्द पडा़ है कबसे,
चल के फिर रिन्दगी कहाँ होगी।


हूँ तो सादामिज़ाज पर ’शिल्पी’,
फ़न में वो सादगी कहाँ होगी ।


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4. बैठे हैं क्यूं तनहा-तनहा :-

बैठे हैं क्यूं तनहा-तनहा।
मैं भी तो हूँ तनहा-तनहा।


पास चलूं क्या सोचेंगे वो,
बस ये सोचूँ तनहा-तनहा।


संबंधो में अरमानों का,
होता है खूँ तनहा-तनहा।


जो पाया सब जग जाहिर है,
खोकर ढूढूँ तनहा-तनहा।


मंजिल कितनी दूर अभी है,
पग-पग नापूँ तनहा-तनहा।


सारे साथी भूखे होंगे,
कैसे खालूँ तनहा-तनहा।


रिश्ते सबके आगे-पीछे,
किसको मानूँ तनहा-तनहा।


तोड़ के बन्धन हर रिश्ते का,
जाते हैं यूँ तनहा-तनहा।


दर्द बुतों का सुनने वाला,
’शिल्पी’ है तू तनहा-तनहा।


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5. गीत/ देते रहना प्यार सभी को :-

देते रहना प्यार सभी को,
लेते रहना प्यार सभी से

 करके देखो खूब मिलेगी,
इज्जत तुमको यार सभी से।

जिसकी कद्र करोगे तुम,
निश्चित वह कद्र करेगा।
प्यार कदाचित जिसको दोगे,
तुमको भद्र कदेगा।
थोडी़ सी खुदगर्जी आई,
पाओगे धिक्कर सभी से.............

खरी बात खोटी कहलाती,
लगती बहुत बुरी है।
स्वाभिमान पर ठेस लगे और,
दिल पे चले छुरी है।
मीठी बोली बोलोगे तो,
लूटोगे सत्कार सभी से.....

दुनिया वाले इक दूजे से,
रखते खूब अपेक्षा।
प्रतिफल अच्छा नहीं मिला तो,
करते खूब उपेक्षा।
करो समीक्षा,पुनः प्रतीक्षा,
कहता समय पुकार सभी से......

सींग,नुकीले दंत और नख,
द्वन्द्व हेतु पाया हर प्राणी।
हर से मिली पृथक मानव को,
बुद्धि,जिह्वा,वाणी।
प्रतिद्वन्दी ’शिल्पी’ बहुतेरे,
रखना शुद्ध विचार सभी से........

Friday, December 18, 2009

एक शायर/विनय मिश्र


जैसा कि आप जानते हैं कि एक शायर स्तम्भ में एक ही ग़ज़लकार की रचनायें हर माह प्रकाशित होंगी।आज सबसे पहले विनय मिश्र की ग़ज़लों से इस स्तम्भ की शुरुआत कर रहा हूँ।
विनय मिश्र वर्तमान दौर में ग़ज़ल विधा के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं और ग़ज़ल के लिये पूरे मनोयोग से जुडे़ हुए हैं।
जीवन परिचय-जन्म तिथि-१२ अगस्त १९६६,शिक्षा-काशी हिन्दू विश्वविद्यालय,वाराणसी से एम०ए०,पी०एच०डी०[हिन्दी],देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ग़ज़लों,कविताओं और आलेखों का प्रकाशन,’शब्द कारखाना’[हिन्दी त्रैमासिक]के ग़ज़ल अंक के अतिथि सम्पादक,सम्प्रति-राजकीय कला स्नातकोत्तर महाविद्यालय अलवर[राज०]के हिन्दी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत।


१-नहीं यूँ ही हवा बेकल है मुझमें-

नहीं यूँ ही हवा बेकल है मुझमें।
है कोई बात जो हलचल है मुझमें।
सुनाई दे रही है चीख कोई,
ये किसकी जिन्दगी घायल है मुझमें।
बहुत देखा बहुत कुछ देखना है,
अभी मीलों हरा जंगल है मुझमें।
लगाये साजिशों के पेड़ किसने,
फला जो नफ़रतों का फल है मुझमें।
बुझाई प्यास की भी प्यास जिसने,
अभी उस ज़िन्दगी का जल है मुझमें।
मेरी हर साँस है तेरी बदौलत,
तू ही तो ऐ हवा पागल है मुझमें।
सवालों में लगी हैं इतनी गाँठें,
कहूँ कैसे कि कोई हल है मुझमें।
दिनोंदिन और धँसती है ग़रीबी,
यूँ बढ़ता कर्ज़ का दलदल है मुझमें।
हवाओं में बिखरता जा रहा हूँ,
कहूँ कैसे सुरक्षित कल है मुझमें।


२-रौशनी है बुझी-बुझी अबतक-

रौशनी है बुझी-बुझी अबतक।
गुल खिलाती है तीरगी अबतक।
एक छोटी-सी चाह मिलने की,
वो भी पूरी नहीं हुई अबतक।
बात करता था जो जमाने की,
वो रहा खुद से अजनबी अबतक।
देखकर तुमको जितनी पाई थी,
उतनी पाई न फ़िर खुशी अबतक।
मौत को जीतने की खातिर ही,
दाँव पर है ये ज़िन्दगी अबतक।
मेरा का़तिल था मेरे अपनों में,
मुझको कोई ख़बर न थी अबतक।


३-गिरने न दिया मुझको हर बार संभाला है-

गिरने न दिया मुझको हर बार संभाला है।
यादों का तेरी कितना अनमोल उजाला है।
वो कैसे समझ पाये दुनिया की हकीक़त को,
सांचे में उसे अपने जब दुनिया ने ढाला है।
ये दिन भी परेशाँ है ये रात परेशाँ है,
लोगों ने सवालों को इस तरह उछाला है।
इंसानियत का मन्दिर अबतक न बना पाये,
वैसे तो हर इक जानिब मस्जिद है शिवाला है।
सपनों में भी जीवन है फुटपाथ पे सोते हैं,
जीने का हुनर अपना सदियों से निराला है।
सब एक खुदा के ही बन्दे हैं जहाँ भर में,
नज़रों में मेरी कोई अदना है न आला है।
गंगा भी नहा आये तन धुल भी गया लेकिन,
मन पापियों का अबतक काले का ही काला है।

४-एक सुबह की भरी ताज़गी अब भी है-

एक सुबह की भरी ताज़गी अब भी है।
इस उजास में एक नमी-सी अब भी है। 

ये दुनिया आज़ाद हुई कैसे कह दूँ,
ये दुनिया तो डर की मारी अब भी है।

 पेड़ बहुत हैं लेकिन सायेदार नहीं,
धूप सफ़र में थी जो तीखी अब भी है।

 उजड़ गया है मंजर खुशियों का लेकिन,
इक चाहत यादों में बैठी अब भी है। 

कान लगाकर इनसे आती चीख सुनो,
इन गीतों में घायल कोई अब भी है। 

हर पल दुविधाओं में रहती है लेकिन,
विश्वासों से भरी ज़िन्दगी अब भी है।


५-सूरजमुखी के फूल-

पूरब की ओर मुँह किये सूरजमुखी के फूल।
होते ही भोर खिल उठे सूरजमुखी के फूल।
उड़ने लगीं हवाइयाँ चेहरे पे ओस के,
जब खिलखिलाके हँस पड़े सूरजमुखी के फूल।
तुम दिन की बात करते हो लेकिन मेरे लिये,
रातों के भी हैं हौसले सूरजमुखी के फूल।
वो भी इन्हीं की याद में डूबा हुआ मिला,
जिसको पुकारते हैं ये सूरजमुखी के फूल।
सूरज का साथ देने की हिम्मत लिये हुए,
धरती की गोद में पले सूरजमुखी के फूल।
मुश्किल की तेज धूप का है सामना मगर,
जीते हैं सिर उठा के ये सूरजमुखी के फूल |
सूरज वो आसमान का मुझमें उतर पडा़,
इक बात ऐसी कह गये सूरजमुखी के फूल।

Thursday, April 30, 2009

बनारस के कवि और शायर/प्रसन्न वदन चतुर्वेदी

आप सभी को मेरा नमस्कार,
आज मैं आप के सामने एक नया ब्लाग लेकर उपस्थित हूँ, परन्तु ये ब्लाग मैंने बनारस के उन कवियों, शायरों के लिये बनाया है जो इस अत्याधुनिक तकनीक से अनभिग्य हैं। बहुत से नये और पुराने कवि,शायर इन्टरनेट की इस नई सुविधा से वंचित हैं और अच्छे रचनाकार होते हुए भी वे ब्लाग की दुनिया में अपरिचित हैं। मैंने सोचा क्यों ना उनके लिये भी कुछ किया जाय।यहाँ हर माह एक रचनाकार की रचनायें आप को पढ़ने को मिलेंगी। आशा ही नही, वरन पूर्ण विश्वास है कि आप का सहयोग जरूर मिलेगा। है न!
                                                                                                               -प्रसन्न वदन चतुर्वेदी