दिनांक 12-3-18 को मोढ़ेला, चाँदपुर, वाराणसी में कवि सम्मेलन और होली मिलन समारोह का आयोजन हुआ
जिसमें काव्यपाठ का अवसर प्राप्त हुआ। उक्त सम्मेलन में श्री बद्री विशाल,
श्री नरेश 'शांडिल्य', श्रीमती रजनी अग्रवाल, नसीम निशा, विनोद 'पानीदार',
'आवारा' , गुरु अमिताभ मिश्र, श्री सन्तोष आदि कवियों-कवियित्रियों ने भी
काव्यपाठ किया और सम्मेलन को एक नई ऊँचाई प्रदान किया। प्रस्तुत है वहाँ के
कुछ छाया चित्र...
Tuesday, March 13, 2018
Wednesday, May 10, 2017
काशी की अमर विभूति प.धर्मशील चतुर्वेदी जी का जयन्ती समारोह
आज काशी की अमर विभूति प.धर्मशील चतुर्वेदी जी की जयन्ती है जिनका हाल ही
में देहांत हो गया था | इस अवसर पर बनारस के साहित्य, चित्रकला, लेखनसे
जुड़े लोगों ने कविताओं, गजलों, और संस्मरण के माध्यम से अपनी श्रद्धांजलि
प्रस्तुत की | मैंने भी उनपर लिखी रचना के जरिए अपनी संवेदना प्रकट किया |
इस अवसर पर प. हरिराम द्विवेदी, श्री जितेन्द्र नाथ मिश्र,प. मदन मोहन
चौबे, सांड बनारसी, अख्तर बनारसी, श्री मान बहादुर सिंह आदि काशी के
गणमान्य नागरिकों सहित उपस्थित थे | इस अवसर पर मेरी कुछ पंक्तियाँ...
"धर्मशील जी व्यक्ति नहीं थे, संस्कृति के संवाहक थे |
काशी की हर एक सभा के आजीवन संचालक थे |
काशी की हर एक सभा में अट्टहास उनका गूँजा,
उनके जैसा जिंदादिल अब और नहीं कोई दूजा,
कला-पारखी, ज्ञानवान थे,निश्छल मानों बालक थे.....
धर्म, कला, साहित्य सभी पर, उनका दखल बराबर था,
न्यायालय या कोई सभा हो सबमे उनका आदर था,
व्यंग्यकार, अधिवक्ता, उम्दा लेखक और विचारक थे....."
"धर्मशील जी व्यक्ति नहीं थे, संस्कृति के संवाहक थे |
काशी की हर एक सभा के आजीवन संचालक थे |
काशी की हर एक सभा में अट्टहास उनका गूँजा,
उनके जैसा जिंदादिल अब और नहीं कोई दूजा,
कला-पारखी, ज्ञानवान थे,निश्छल मानों बालक थे.....
धर्म, कला, साहित्य सभी पर, उनका दखल बराबर था,
न्यायालय या कोई सभा हो सबमे उनका आदर था,
व्यंग्यकार, अधिवक्ता, उम्दा लेखक और विचारक थे....."
Sunday, November 6, 2016
सम्मान समारोह और पराड़कर जयन्ती
आज नागरी प्रचारिणी सभा में मुम्बई से आये दो शायरों श्री लक्ष्मण दूबे और शमीम अब्बास जी का सम्मान समारोह हुआ जिसमें बनारस के कवि और शायर डा. ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेदी जी की एक गीत और एक ग़ज़ल की पुस्तक का विमोचन भी हुआ। इस अवसर पर प. हरिराम द्विवेदी, श्री जितेंद्र नाथ मिश्र , श्री मेयार स्नेही, श्री केशव शरण, श्री सुरेंद्र वाजपेयी,श्री ओम धीरज, श्री नरोत्तम शिल्पी, श्री कुंवर सिंह कुंवर, श्री अलकबीर आदि बनारस के कई स्वनामधन्य साहित्यकार उपस्थित थे।कार्यक्रम का संचालन जाने माने ग़ज़लकार और 'समकालीन स्पंदन' के संपादक श्री धर्मेंद्र गुप्त 'साहिल' ने किया। इस अवसर के कुछ छायाचित्र:-
आज पराड़कर जी की जयन्ती के अवसर पर पराड़कर भवन में एक गोष्ठी का आयोजन भी हुआ जिसमे पराड़कर जी के पत्रकारिता में योगदान के साथ वर्तमान चुनौतिओं पर भी चर्चा की गयी |
आज पराड़कर जी की जयन्ती के अवसर पर पराड़कर भवन में एक गोष्ठी का आयोजन भी हुआ जिसमे पराड़कर जी के पत्रकारिता में योगदान के साथ वर्तमान चुनौतिओं पर भी चर्चा की गयी |
Tuesday, August 30, 2016
शाश्वत कृष्णायन का लोकार्पण
दिनांक 27-8-2016 को मेरे पिताजी श्री मदन मोहन चतुर्वेदी की पुस्तक
"शाश्वत कृष्णायन" का
विमोचन (लोकार्पण) श्रृंगेरी मठ, महमूरगंज वाराणसी में श्री महेंद्रनाथ
पांडेय मानव
संसाधन राज्यमंत्री, भारत सरकार द्वारा संपन्न हुआ। इसके पूर्व पिताजी
"शाश्वत रामायण" की रचना भी कर चुके हैं जिसका लोकार्पण तत्कालीन सर
संघचालक श्री कुप्पाहाली सीतारमय्या सुदर्शन जी ने 2006 में किया था |
बाएं से पंडित मदन मोहन चतुर्वेदी (रचनाकार), केंद्री य
ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सतीशचंद्र मिश्र, मानव संसाधन
राज्यमंत्री डा. महेंद्र नाथ पांडेय, काशी विद्वत परिषद् के अध्यक्ष
महामहोपाध्याय प्रो. रामयत्न शुक्ल और संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति
प्रो. यदुनाथ दूबे जी शाश्वत कृष्णायन के विमोचन के दौरान......
कार्यक्रम के प्रारम्भ में मुख्य अतिथि दीप प्रज्ज्वलन करते हुए (ऊपर)......
नीचे कार्यक्रम और मंच पर उपस्थित विद्वतजनों के कुछ अन्य फोटो....
बाएं से पंडित मदन मोहन चतुर्वेदी (रचनाकार), केंद्री य
ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सतीशचंद्र मिश्र, मानव संसाधन
राज्यमंत्री डा. महेंद्र नाथ पांडेय, काशी विद्वत परिषद् के अध्यक्ष
महामहोपाध्याय प्रो. रामयत्न शुक्ल और संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति
प्रो. यदुनाथ दूबे जी शाश्वत कृष्णायन के विमोचन के दौरान......
कार्यक्रम के प्रारम्भ में मुख्य अतिथि दीप प्रज्ज्वलन करते हुए (ऊपर)......
नीचे कार्यक्रम और मंच पर उपस्थित विद्वतजनों के कुछ अन्य फोटो....
बाएं से पंडित मदन मोहन चतुर्वेदी (रचनाकार), केंद्री
कार्यक्रम के प्रारम्भ में मुख्य अतिथि दीप प्रज्ज्वलन करते हुए (ऊपर)......
नीचे कार्यक्रम और मंच पर उपस्थित विद्वतजनों के कुछ अन्य फोटो....
बाएं से पंडित मदन मोहन चतुर्वेदी (रचनाकार), केंद्री
कार्यक्रम के प्रारम्भ में मुख्य अतिथि दीप प्रज्ज्वलन करते हुए (ऊपर)......
नीचे कार्यक्रम और मंच पर उपस्थित विद्वतजनों के कुछ अन्य फोटो....
Saturday, May 25, 2013
बनारस के शायर/मेयार सनेही
मैं इस ब्लाग का शुभारम्भ बनारस के जाने माने मशहूर शायर ज़नाब "मेयार सनेही"जी से कर रहा हूँ। इनका जन्म ०७-०३-१९३६ में हुआ। बनारस के कवि सम्मेलनों, कवि गोष्ठियों और मुशायरों को अपने शेरों से आप एक नई ऊँचाई प्रदान करते हैं । आप की ग़ज़लें,नज़्म विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में समय समय पर छपती आ रही हैं और आप की १९८४ में एक नज़्म की पुस्तक "वतन के नाम पाँच फ़ूल" भी प्रकाशित हो चुकी है। लगभग ४० सालों से आप साहित्य सर्जना में लगे हैं और ये क्रम अभी जारी है।
निवास-एस.७/९बी,गोलघर कचहरी,वाराणसी।
सम्पर्कसूत्र-९९३५५२८६८३
तो लीजीए उनकी ग़ज़लों का आनन्द........
1. ग़ज़ल/ कैसे वो पह्चाने ग़म :-
कैसे वो पह्चाने ग़म ।
पत्थर है क्या जाने ग़म।
दुनिया मे जो आता है,
आता है अपनाने ग़म।
नये गीत लिखवाने को,
आये किसी बहाने ग़म।
जब तक मेरी साँस चली,
बैठे रहे सिरहाने ग़म।
मैनें सोचा था कुछ और,
ले आये मयख़ाने ग़म।
जिसको अपना होश नहीं,
उसको क्या गरदाने ग़म।
दिल सबका बहलाते हैं,
जैसे हों अफ़साने ग़म।
क्या कहिये ’मेयार’ उसे,
जो खुशियों को माने ग़म।
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2. ग़ज़ल/ मोहब्बत की नुमाइश चल रही है :-
मोहब्बत की नुमाइश चल रही है।
मगर परदे में साजिश चल रही है।
वो बातें जिनसे मैं जख़्मी हुआ था,
अब उन बातों में पालिश चल रही है।
वो इक सजदा जो मुझसे हो न पाया,
उसी को लेके रंजिश चल रही है।
वो देखो जिन्दगी ठहरी हुई है,
मगर जीने की ख़्वाहिश चल रही है।
कोई ’मेयार’ होगा जिसकी खातिर,
सिफ़ारिश पर सिफ़ारिश चल रही है।
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3.ग़ज़ल/मेयार सनेही/कौन बे-ऐब है पारसा कौन है :-
कौन बे-ऐब है पारसा कौन है ?
किसको पूजे यहाँ देवता कौन है ?
जब चलन में है दोनों तो क्या पूछना,
कौन खोटा है इनमें खरा कौन है ?
ज़हर देता रहे औ’ मसीहा लगे,
आप जैसा यहाँ दूसरा कौन है?
रूप है इल्म है सौ हुनर हैं मगर,
ऐसी चीजों को अब पूछता कौन है?
अन्न उपजाने वाला मरा भूख से,
इस मुक़द्दर का आख़िर ख़ुदा कौन है ?
कौन ’मेयार’है यह नहीं है सवाल,
ये बताएँ कि वो आपका कौन है ?
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4. ग़ज़ल/ हसीं भी है मोहब्बत की अदाकारी :-
हसीं भी है मोहब्बत की अदाकारी भी रखता है।
मगर उससे कोई पूछे वफ़ादारी भी रखता है ।
इलाजे-जख़्मे-दिल की वो तलबगारी भी रखता है,
नये जख़्मों की लेकिन पूरी तैयारी भी रखता है।
इक ऐसा शख्स मेरी ज़िन्दगी में हो गया दाख़िल,
जो मुझको चाहता है मुझसे बेज़ारी भी रखता है।
वो मत्था टेकता है गिड़गिड़ाता है कि कुछ दे दो,
फ़िर उसके बाद ये दावा कि खुद्दारी भी रखता है।
वही है आजकल का बागबाँ जो हाथ में अपने,
दरख़्तों की कटाई के लिये आरी भी रखता है।
ख़ुदा के नाम पर भी तुम उसे बहका नहीं सकते,
वो दीवाना सही लेकिन समझदारी भी रखता है।
तुम उसके नर्म लहजे पर न जाओ ऐ जहाँ वालों,
वो है ’मेयार’ जो लफ़्जों में चिनगारी भी रखता है।----------------------------------------------
मेयार सनेही जी ने नये-नये रदीफ़ और काफ़िया को लेकर कई ग़ज़लें कही हैं जैसे इस ग़ज़ल में.........
5. ग़ज़ल/ इक गीत लिखने बैठा था :-
इक गीत लिखने बैठा था मैं कल पलाश का।
ये बात सुन के हँस पडा़ जंगल पलाश का ।
साखू को बे-लिबास जो देखा तो शर्म से,
धरती ने सर पे रख लिया आँचल पलाश का।
रितुराज के ख़याल में गुम होके वन-परी,
कब से बिछाये बैठी है मख़मल पलाश का।
सूरज को भी चराग़ दिखने लगा है अब,
बढ़ता ही जा रहा है मनोबल पलाश का।
रंगे-हयात है कि है मौसम का ये लहू,
या फ़िर किसी ने दिल किया घायल पलाश का।
तनहा सफ़र था राह के मंजर भी थे उदास,
अच्छा हुआ कि मिल गया संबल पलाश का।
’मेयार’ इन्कलाब का परचम लिये हुए,
उतरा है आसमान से ये दल पलाश का।
Friday, May 24, 2013
बनारस के कवि/शायर-केशव शरण
1. कौन अब है आने वाला :-
कौन अब है आने वाला ।
जा चुका है जाने वाला ।
हाथ मलता रह गया है,
पा न पाया पाने वाला ।
कौन उसको चुप कराये,
रो रहा है गाने वाला ।
तू तो थोडी़ दे तसल्ली,
हर कोई है ताने वाला ।
दर्द से वाकि़फ़ नहीं है,
दिल को वो समझाने वाला ।
क्या न ये उल्फ़त कराये,
काम ये दीवाने वाला ।
हो नहीं सकता है कोई,
उसके जैसा भाने वाला ।
छीन बैठा चांद मेरा,
मेघ काला छाने वाला ।
अब नहीं आबाद होगा,
मेरा घर वीराने वाला ।
---------------------------
2. मुहब्बत के पीछे ज़माना पडा़ है :-
मुहब्बत के पीछे ज़माना पडा़ है।
मुझे प्यार अपना छुपाना पडा़ है।
बुरा होता दुनिया को नाराज़ करना,
मुझे अपने दिल को दुखाना पडा़ है।
यहाँ आज खुशियों के लाले हुए हैं,
जहां पर ग़मों का ख़ज़ाना पडा़ है।
जो मैं रो रहा था तो कोई न रोया,
सभी गा रहे हैं तो गाना पडा़ है।
बगा़वत कहीं इससे आसान होती,
मुझे खु़द को जितना मनाना पडा़ है।
नहीं कोई विश्वास रिश्तों पे हमको,
मगर जग के नाते निभाना पडा़ है।
कहाँ तेरे आगोश में मस्त रहता,
कहाँ पस्त तेरा दीवाना पडा़ है।
----------------------------------
3. बयां क्या दूं सफ़र की मुश्किलों पर :-
बयां क्या दूं सफ़र की मुश्किलों पर।
ये राहें ले न जाती मंजिलों पर।
बिखर जाना है इनको बीहडो़ में,
भरोसा क्या करूँ मैं काफ़िलों पर।
मैं तनहाई का जो इल्जाम धरता,
तो जाता वो तुम्हारी महफ़िलों पर।
बहुत भारी है दिलबर को गवाना,
जमाने भर के सारे हासिलों पर।
कोई-कोई समुन्दर में उतरता,
पडी़ रहती है दुनिया साहिलों पर।
-------------------------------
4. अजब मैं भी जफ़ाओं पर फ़िदा हूँ :-
अजब मैं भी जफ़ाओं पर फ़िदा हूँ।
हसीनों की अदाओं पर फ़िदा हूँ।
बरसना जो नहीं कुछ जानती हैं,
उन्हीं रंगी घटाओं पर फ़िदा हूँ।
पुराना पेड़ सूखा जा रहा है,
अमरबेलों,लताओं पर फ़िदा हूँ।
वतन की खुश्बुएं ले जा रहीं है,
विदेशों की हवाओं पर फ़िदा हूँ।
ग़रीबी भूल जाता हूँ मैं अपनी,
अमीरी की कथाओं पर फ़िदा हूँ।
अकेलापन नहीं जाता है लेकिन,
मैं इन्दर की सभाओं पर फ़िदा हूँ।
जो मायावी बदन की मालकिन है,
मैं ऐसी आत्माओं पर फ़िदा हूँ।
बढा़ ही जा रहा है मर्ज़ मेरा,
मगर तेरी दवाओं पर फ़िदा हूँ।
-----------------------------------
5. अभी इतिहास का वो पल नहीं :-
अभी इतिहास का वो पल नहीं आया तो आयेगा।
हमारा वो सुनहरा कल नहीं आया तो आयेगा।
उम्मीदों के सहारे ही तो दुनिया चल रही है ये,
समस्याओं का कोई हल नहीं आया तो आयेगा।
जमाने से ये माली कह रहे हैं पेड़ अच्छा है,
अगर इस साल उस पर फल नहीं आया तो आयेगा।
डगर की शर्त पूरी है मुसाफ़िर चल पडा़ होगा,
नहर में गर लहर कर जल नहीं आया तो आयेगा।
नजूमी कह रहा है देखकर हाथों की रेखाएं,
तुम्हारा भाग्य है चंचल नहीं आया तो आयेगा।
किसी का हुश्न है मग़रूर क्या मिलना ग़रीबों से,
किसी का इश्क है पागल नहीं आया तो आयेगा।
जिसे हो देश की चिन्ता,जिसे परवाह जनता की,
कभी सरकार में वो दल नहीं आया तो आयेगा।
निवास- एस.2/564, सिकरौल,वाराणसी
मोबाइल नं०-9415295137
Thursday, May 23, 2013
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